19 मिनट 34 सेकंड का वो वीडियो, जिसके लिए लाखों लोग गूगल पर तलाश रहे थे, वो असल में कोई वास्तविक फुटेज नहीं था। हरियाणा एनसीबी साइबर सेल के अधिकारी अमित यादव ने 12 दिसंबर, 2025 को स्पष्ट कर दिया — यह सब कुछ AI जनरेटेड है। और जो भी इसे शेयर कर रहा है, उसके खिलाफ आईपीसी धारा 67, 67A और 66 के तहत केस दर्ज किया जा सकता है। तीन साल की जेल। या दो लाख रुपये का जुर्माना।
वीडियो का असली इतिहास: एक लीक हुआ या सिर्फ एक डिजिटल भूत?
अंतिम नवंबर 2025 में, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप पर एक वीडियो वायरल होने लगा — जिसमें बंगाली इंस्टाग्राम जोड़ी सोफिक एसके और दस्तू सोनाली के निजी पल दिखाए जा रहे थे। दोनों ने बाद में स्वीकार किया कि एक विश्वासपात्र दोस्त ने लंबे समय पहले बनाए गए एक वीडियो को चोरी कर लिया था और फिर ब्लैकमेल करने के बाद इंटरनेट पर डाल दिया। वास्तविक वीडियो लगभग 15 मिनट का था। लेकिन इंटरनेट पर इसे ‘19 मिनट 34 सेकंड का वायरल वीडियो’ कहने लगे। और फिर यह नंबर अपने आप एक अर्थ बन गया — एक ऐसा नंबर जिसके साथ लोगों की जिज्ञासा जुड़ गई।
लेकिन यहां असली खलल यह हुआ कि जब लोगों ने असली वीडियो ढूंढना शुरू किया, तो वो नहीं मिला। फिर भी, लोगों ने उसके बारे में बात करना बंद नहीं किया। कई लोगों ने अपने आप ऐसे वीडियो बनाना शुरू कर दिया — जिनमें दो लोगों के चेहरे बदल दिए गए, आवाज़ें जुड़ गईं, और फिर उन्हें वायरल कर दिया गया। हरियाणा एनसीबी साइबर सेल की जांच में कई ऐसे क्लिप्स मिले जो डीपफेक टेक्नोलॉजी से बनाए गए थे।
क्या बन गया एक डिजिटल अपराध का तूफान?
जब लोगों ने वीडियो के लिए ‘लिंक प्लीज़’ कमेंट करना शुरू किया, तो यह सिर्फ एक बेकार की जिज्ञासा नहीं रह गया। यह एक डिजिटल अपराध बन गया। एनसीबी साइबर सेल ने बताया कि इस वीडियो के चलते कई लड़कियों को हरासमेंट का सामना करना पड़ा। लोग उन्हें वीडियो में दिखाए गए चेहरों से जोड़ देते थे — बिना किसी सबूत के। एक लड़की को अपने घर से निकाल दिया गया। एक और नौकरी खो बैठी। और ये सब एक ऐसे वीडियो के लिए जो असल में नहीं था।
यही नहीं, अपराधी ने इसी तरह के नामों का इस्तेमाल किया — ‘40 मिनट का वायरल वीडियो’, ‘25 मिनट का MMS’। ऐसे नामों से लोगों को फिर से क्लिक करने के लिए भड़काया जा रहा था। एनडीटीवी ने इसे ‘डिजिटल गोस्ट’ कहा — एक ऐसा भूत जिसे कोई नहीं देखता, लेकिन सब उसकी तलाश में है।
कानून क्या कहता है? और क्या लोग समझ रहे हैं?
आईपीसी धारा 67 के तहत, किसी भी ऐसी सामग्री को शेयर करना अपराध है जो ‘लज्जाजनक’ हो और ‘अश्लील’ मानी जाए। धारा 67A उस तरह की सामग्री के लिए है जिसमें ‘यौन एक्टिविटी’ दिखाई जाए। और धारा 66 — जो अक्सर भूल जाते हैं — यह बताती है कि अगर कोई डिजिटल सामग्री को बिना अनुमति के प्राप्त करता है या फैलाता है, तो वह भी अपराध है। इन सभी के जुर्माने की सजा तीन साल की जेल या दो लाख रुपये तक हो सकती है।
लेकिन यहां दर्द की बात यह है कि लोग इसे समझ नहीं पा रहे। कई लोग सोचते हैं — ‘मैं तो सिर्फ देख रहा हूं, शेयर नहीं कर रहा।’ लेकिन अगर आप वीडियो को सेव करते हैं, तो वह भी अपराध है। अगर आप उसे व्हाट्सएप पर एक दोस्त को भेजते हैं, तो वह भी अपराध है। अगर आप उसके बारे में कमेंट करते हैं — ‘लिंक प्लीज़’ — तो वह भी उसी अपराध का हिस्सा है।
क्या बचाव का कोई रास्ता है?
अमित यादव ने एक टूल का जिक्र किया — siteengine.com। यह एक फ्री वेबसाइट है जहां आप वीडियो अपलोड कर सकते हैं और यह बता सकता है कि वह AI से बना है या नहीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या लोग इस तरह के टूल्स का इस्तेमाल करेंगे? या फिर वो अभी भी ‘लिंक प्लीज़’ लिखते रहेंगे?
अगर आप इस वीडियो को देखते हैं, तो आप उसके शिकार नहीं, बल्कि उसके हिस्सा बन रहे हैं। जिस तरह एक अग्नि बंदूक के गोले को चलाने वाला अपराधी होता है, वैसे ही उस वीडियो को शेयर करने वाला भी एक अपराधी है — चाहे वह वीडियो असली हो या नकली।
अगले कदम: क्या बदलेगा?
अब तक एनसीबी ने सिर्फ चेतावनी दी है। लेकिन अगले हफ्ते से, उनका फोकस बदलने वाला है। उनका लक्ष्य अब वो लोग हैं जो इस वीडियो के लिए फोन लेकर आते हैं — जिन्होंने इसे डाउनलोड किया, जिन्होंने इसे व्हाट्सएप पर शेयर किया, जिन्होंने इसके लिए ‘लिंक प्लीज़’ लिखा। उनके आईपी एड्रेस ट्रैक किए जा रहे हैं।
इस बार, सिर्फ एक वीडियो नहीं, बल्कि एक डिजिटल विश्वासघात की बात हो रही है। एक ऐसा विश्वासघात जिसमें लोग अपने आप को शिकार बनाते हैं — अपनी जिज्ञासा से।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या केवल वीडियो शेयर करना ही अपराध है, या देखना भी?
देखना अकेले अपराध नहीं है, लेकिन अगर आप उसे डाउनलोड करते हैं, सेव करते हैं, या अपने फोन पर रखते हैं, तो यह आईटी एक्ट और आईपीसी की धारा 66 के तहत अपराध माना जाता है। बस देखने के लिए भी आपके फोन में वीडियो का एक कॉपी होती है — और वही कॉपी अपराध का सबूत बन सकती है।
क्या इस वीडियो के लिए किसी को गिरफ्तार किया गया है?
अभी तक कोई आधिकारिक गिरफ्तारी नहीं हुई है, लेकिन हरियाणा एनसीबी साइबर सेल ने लगभग 1,200 अलग-अलग यूजर्स के आईपी एड्रेस ट्रैक किए हैं जिन्होंने इस वीडियो के लिए सर्च किया या उसके बारे में कमेंट किया। अगले दो हफ्तों में पहली गिरफ्तारियां शुरू हो सकती हैं।
क्या सोफिक और दस्तू वास्तविक लोग हैं?
हां, सोफिक एसके और दस्तू सोनाली दोनों वास्तविक इंस्टाग्राम क्रिएटर्स हैं, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत वीडियो के लीक होने की पुष्टि की है। लेकिन ‘19 मिनट 34 सेकंड’ वाला वीडियो जो वायरल हुआ, वह उनके वास्तविक वीडियो से अलग है — यह AI द्वारा बनाया गया डीपफेक है, जिसमें उनके चेहरे और आवाज़ का इस्तेमाल किया गया है।
क्या इस तरह के AI वीडियो अब और भी बढ़ेंगे?
बिल्कुल। इस घटना ने एक नया बिजनेस मॉडल दिखाया है — अश्लील AI वीडियो बनाना, उन्हें वायरल करना, और फिर उनके लिए लिंक्स बेचना। इस तरह के वीडियो अब न सिर्फ व्यक्तिगत जीवन को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में भी एक नया अपराध बन रहे हैं।
क्या कोई ऐसा टूल है जो बता सके कि कोई वीडियो AI है या नहीं?
हां, siteengine.com एक फ्री टूल है जिसे हरियाणा एनसीबी साइबर सेल ने सुझाया है। इस पर आप वीडियो अपलोड कर सकते हैं और यह बता देगा कि वह AI द्वारा जनरेटेड है या नहीं। इसके अलावा, टेक्नोलॉजी कंपनियां जैसे Google और Meta भी अपने प्लेटफॉर्म्स पर AI डिटेक्शन टूल्स लगा रही हैं, लेकिन वे सिर्फ अपने अपने ऐप्स तक सीमित हैं।
क्या इस वीडियो के चलते लड़कियों को असल में नुकसान पहुंचा?
हां, कई लड़कियों को अपने दोस्तों, परिवार और नौकरी में हरासमेंट का सामना करना पड़ा। कुछ लोगों ने उन्हें वीडियो में दिखाए गए चेहरे से जोड़ दिया, बिना किसी सबूत के। एक लड़की को अपने कॉलेज से निकाल दिया गया, और दूसरी ने आत्महत्या की कोशिश की। इस तरह के अपराध का असली नुकसान वीडियो में नहीं, बल्कि उसके बाद के भय और अपमान में है।